डिजिटल भुगतान: कार्ड पेमेंट (पार्ट-४): धोखाधड़ी की रोकथाम

यह कार्ड भुगतान पर मेरी श्रृंखला का अंतिम भाग है और इस पोस्ट में मैं कार्ड उपभोक्ताओं को लक्षित कुछ आम धोखाधड़ी के तरीकों को कवर करने की कोशिश करूँगा। हम यह भी देखेंगे कि आप इन सबसे अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं।

स्किमिंग: लेनदेन के समय आपके कार्ड की जानकारी चुराने और फिर उस जानकारी का दुरुपयोग करने की प्रक्रिया ‘स्किमिंग’ है। स्किमिंग के द्वारा आपके कार्ड पर धोखे से लेनदेन की जाती है। इसमें जब भी कार्ड को पीओएस या एटीएम डिवाइस पर स्वाइप किया जाता है तो जालसाज स्वाइप के समय कार्ड की जानकारी चुराने के लिए एक बाहरी कार्ड रीडर को अटैच करता है।

इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए सबसे प्रभावी उपाय चिप (ईएमवी) कार्ड का प्रयोग है। आरबीआई ने सभी कार्ड जारीकर्ताओं को यह सुनिश्चित करना अनिवार्य कर दिया है कि जारी किए गए सभी डेबिट और क्रेडिट कार्ड चिप कार्ड हों। एटीएम मशीनें अपने कार्ड रीडर्स को ऐसे डिजाइन कर रही हैं ताकि किसी भी अतिरिक्त बाहरी घटक को अटैच करना मुश्किल हो सके। पर अपने-आप को इससे बचाने के लिए कुछ सावधानियाँ इस प्रकार हैं:

एक स्किम्मर का उदाहरण

१. सुनिश्चित करें कि कार्ड हर समय आपकी दृष्टि में रहे और जिस डिवाइस पर कार्ड स्वाइप किया जा रहा है वह आपको स्पष्ट रूप से दिखाई देता रहे। और इसमें कोई बाहरी घटक डिवाइस से जुड़ा हुआ नहीं रहे।

एटीएम स्किम्मर

२. एटीएम का उपयोग करते समय सुनिश्चित करें कि एटीएम के कार्ड रीडर से कोई बाहरी घटक जुड़ा हुआ नहीं है (कई एटीएम जो अभी भी चुंबकीय रीडर का उपयोग करते हैं, कार्ड रीडर में कार्ड प्रविष्टि को बाधित करने के लिए “जिटर ” का उपयोग करते हैं; जो यह सुनिश्चित करता है कि कार्ड डेटा बाहरी डिवाइस द्वारा कैप्चर नहीं किया जा रहा है)। कार्ड रीडर पर किसी बाहरी घटक संलग्न होने की पहचान करने का एक तरीका कार्ड रीडर से प्रकाश के “ब्लिंक” होने को सुनिश्चित करना भी है। यदि आप स्पष्ट रूप से कार्ड रीडर पर प्रकाश नहीं देख सकते है तो उस एटीएम का उपयोग करने से बचें।

इस प्रकार की धोखाधड़ी लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में विशेष रूप से प्रचलित है। कारण यह है कि कार्ड एक पर्यटक का है जो अपनी अपने घर लौटकर बाहर में की गयी कार्ड गतिविधियोँ की समुचित जाँच और पूछताछ नहीं कर पाता। यात्रा के समय आपको कार्ड को लेकर ज्यादा सचेत रहना चाहिए। अपने हाल के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर मैंने देखा कि वहाँ के दुकानदार आपको खुद से कार्ड स्वाइप करने के लिए प्रेरित करते हैं, जो एक सुरक्षित तरीका है।

फ़िशिंग: फ़िशिंग वही है जो इसका शाब्दिक अर्थ लगता है (मछली पकड़ना)। इसमें जालसाज, लोगों को अपनी संवेदनशील जानकारी प्रकट करने के लिए लक्षित करता है। फ़िशिंग के बारे में जानने का एक और मनोरंजक तरीका है, नेटफ्लिक्स “जामतारा” वेब-सीरीज जो एक दूरदराज शहर के युवाओं के एक दल द्वारा चलाए जा रहे टेली-कॉलिंग फिशिंग रैकेट पर आधारित है।

विकिपीडिया परिभाषा के अनुसार, “इलेक्ट्रॉनिक संचार में फ़िशिंग एक छुपे हुए जालसाज द्वारा उपभोक्ता का नाम, पासवर्ड और क्रेडिट कार्ड विवरण के रूप में संवेदनशील जानकारी प्राप्त करने के लिए धोखाधड़ी का प्रयास है।”

यदि आपको अपने जारीकर्ता या किसी अन्य इकाई से कॉल, एसएमएस या ई-मेल प्राप्त होता है जिसमें आपसे कार्ड नंबर, पिन, सीवीवी, ओटीपी, नेट बैंकिंग आईडी और पासवर्ड आदि जैसी संवेदनशील जानकारी साझा करने का अनुरोध किया जाता है तो इस तरह की धोखाधड़ी से खुद को बचाने का एकमात्र तरीका यह है कि किसी भी माध्यम पर अपनी संवेदनशील जानकारी साझा न करें। आपका बैंक कॉल, एसएमएस या ई-मेल पर ये विवरण कभी नहीं पूछेगा।

वेबसाइट स्पूफिंग: इसमें धोखेबाज एक वेबसाइट बनाएंगे जो किसी अन्य विश्वसनीय इकाई की वेबसाइट की तरह दिखती हो; यहां तक कि यूआरएल भी समान दिखता हो (सामान्यतः इसमें किसी एक करैक्टर को बदल दिया गया रहता है)। इसका बचने का एक सरल तरीका है कि आप ई-मेल या एसएमएस पर प्राप्त लिंक पर क्लिक करने के बजाय यूआरएल को स्वयं टाइप करें।

स्पूफ़िंग का एक उदाहरण

वेबसाइटों द्वारा उपभोक्ताओं को सही पेज पर पहुँचाने के लिए कुछ चेक और नियंत्रण दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ वेबसाइटों में एक छवि या संदेश प्रदर्शित होता है जिसमें आपको संवेदनशील जानकारी इनपुट करनी होती है। एचडीएफसी बैंक नेटबैंकिंग एक तस्वीर और आपके द्वारा चयनित संदेश अपने लॉग-इन पृष्ठ पर प्रदर्शित करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आप अपनी जानकारी प्रामाणिक बैंक के पेज पर डाल रहे हैं न कि किसी अन्य स्पूफ्ड वेबसाइट पर।

सोशल इंजीनियरिंग: धोखाधड़ी का यह तरीका किसी उद्देश्य के लिए उपयोग की जा सकने वाली गोपनीय या व्यक्तिगत जानकारी को प्राप्त करने के लिए जालसाज द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। ऊपर बताई गई ‘फिशिंग’ एक प्रकार की सोशल इंजीनियरिंग है। इस संदर्भ में सोशल इंजीनियरिंग के कुछ अन्य तरीके हैं ‘विशिंग’ – जहां धोखेबाज किसी कंपनी के ग्राहकों से संवेदनशील जानकारी प्राप्त करने के लिए उसके आईवीआर (इंटरएक्टिव वॉयस रिस्पांस) की नकल करेंगे; या फिर ‘बेटिंग’ – जिसमे जालसाज आपको ई-मेल या एसएमएस पर एक लिंक भेजेगा जिससे आप कुछ इनाम या कुछ नुकसान के खतरे के वादे के कारण संक्रमित लिंक पर क्लिक कर बैठेंगे।

वास्तविक दुनिया में नाइजीरिया या सूडान का कोई राजकुमार आपके साथ अपनी संपत्ति साझा करने के लिए मरा नहीं जा रहा; न तो आपने किसी कोका-कोला या रीडर्स-डाइजेस्ट की लॉटरी जीती है। आरबीआई या आयकर विभाग भी आपके खाते में पैसे नहीं डाल रहे, और न ही पीएम नरेंद्र मोदी आपको स्विस बैंक से वापस लाये पंद्रह लाख रुपये देना चाहते हैं। इस लिए अपना बैंक अकाउंट या कोई अन्य व्यक्तिगत जानकारी किसी को न भेजें। रसोई गैस की सब्सिडी पाने के लिए भी आपको बस अपना आधार कार्ड अपने बैंक अकाउंट से लिंक करना होता है, और कुछ नहीं।

मनी-म्यूल: एक मनी-म्यूल जिसे कई बार ‘समर्फर’ भी कहा जाता है, वह व्यक्ति है जो धोखेबाजों को अवैध रूप से पैसे हस्तांतरण में मदद करता है। यदि आपको कोई ऐसी कहानी सुनाता है कि उसे बहुत सा धन ट्रांसफर करना है और आपके अकाउंट को कुछ दिनों के लिए पैसे “पार्क करने” और फिर आगे ट्रांसफर करने का जरिया बनाना चाहता है तो समझ जाएँ कि आपको एक बड़े फ्रॉड में फंसाने की तैयारी है।

जब पैसा डिजिटल रूप से ट्रांसफर होता है, तो यह एक “ट्रेल” यानि निशान छोड़ देता है और इसका उपयोग जालसाज की पहचान करने और गिरफ्तार करने के लिए किया जा सकता है। इससे बचने के लिए धोखेबाज बड़ी संख्या में विभिन्न खातों के माध्यम से पैसे भेजकर एक विस्तृत निशान बनाते हैं। यदि आप एक मनी-म्यूल के रूप में कार्य करते हैं तो आप धोखाधड़ी में एक सह षड्यंत्रकारी बन जाते है और किसी भी आपराधिक कार्यवाही होगी तो आप उत्तरदाई होंगे। तो थोड़े फायदे के लिए अपराधी बनने से बचें।

अपने मोबाइल फोन की रक्षा करें: इन दिनों डिजिटल लेनदेन के समय आपका मोबाइल फोन बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। कई मामलों में आपके मोबाइल डिवाइस का उपयोग प्रमाणीकरण के एक मोड के रूप में प्रयोग किया जाता है। अधिकांश समय आपके मोबाइल फोन पर प्राप्त ओटीपी का उपयोग २-कारक प्रमाणीकरण के रूप में किया जाता है और कई बार वेबसाइटों और मोबाइल ऐप्स आपके कार्ड विवरण को स्टोर करते हैं।

अब आप कल्पना कीजिये कि आपने अपना फोन खो दिया और वह किसी जालसाज को मिल गया। आपका फोन अनलॉक है क्योंकि आपने फोन को पासवर्ड या फिंगरप्रिंट से प्रोटेक्ट नहीं किया है। जालसाज ने देखा कि अपने फोन में आपने अपने टेलीकॉम ऑपरेटर का एप्प रखा है जिसमे आपका कार्ड इन्फॉर्मेशन भी सेव किया हुआ है। अब वह जालसाज आपके कार्ड की जानकारी और आपके फोन पर आने वाले ओटीपी को प्रयोग करके कोई भी ऑनलाइन खरीददारी कर सकता है। इस घटना से आपको सिर्फ कार्ड के पीछे लिखा सीविवि नंबर बचा सकता है, पर यह जानकारी भी आपसे धोखे से ली जा सकती है।

इस मामले में मेरी एकमात्र सलाह है कि १. अपने मोबाइल नंबर को केवल उन ऐप्स/वेबसाइट पर स्टोर करें जिनका आप अक्सर उपयोग करते हैं; २. अपने स्मार्टफोन पर एक्सेस कंट्रोल सेट करें चाहे वह पिन, पैटर्न, फिंगरप्रिंट या फेस आईडी में से कोई भी सुरक्षा हो, ३. अपना फोन खोने न दें और खोने पर अपने कार्ड के साथ अपना फोन नंबर भी ब्लॉक करवा दें।

अंत में एक महत्वपूर्ण सलाह यह है कि अगर आप किसी भी प्रयोजन से अपनी आईडी प्रूफ या के.वाई.सी. की कॉपी दे रहे हों तो उसपर तारीख और प्रयोजन लिख कर हस्ताक्षर करें ताकि आपका वह प्रमाण किसी जालसाज द्वारा आपके बैंक में जमा करके बैंक को कोई निर्देश देने (उदाहरण के लिए पता बदलने, कार्ड के पुनः जारी करने, पिन का पुनः जारी करने, नई चेक बुक आदि) के लिए प्रयोग में नहीं लाया जा सके।

इस लेख का हिंदी अनुवाद मेरे ट्विटर मित्र राहुल तिवारी ने किया है। आप लोग उनको ट्विटर पे @In_Blogger फॉलो कर सकते हैं।

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